वैज्ञानिक तरीके से ऐसे करें किसान बन्धु सरसो की खेती !

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पटना : हरियाणा, राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, उत्‍तर प्रदेश, बिहार और महाराष्‍ट्र की एक प्रमुख फसल है सरसों। यह एक प्रमुख तिलहन फसल है। इसकी खास बात है की यह सिंचित और बारानी, दोनों ही अवस्‍थाओं में उगाई जा सकती है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि सिंचित क्षेत्रों में फसल पर बीमारियों का हमला ज्‍यादा हुआ है, खासकर रसचूसक कीटों और फंगस का। इससे सरसों उत्‍पादन में काफी कमी आई है।

सरसों की फसल लेने के लिए दोमट व हल्की दोमट मृदाएं सर्वोत्तम रहती है, जिनमें उचित जल निकासी की व्यवस्था हो। इसको हल्की ऊसर भूमि में भी बोया जा सकता है। इसलिए सरसों को कभी भी ऐसी भूमि में नहीं बोना चाहिए जिसमें पानी खड़ा रहने की संभावना हो।

किसान भाइयों को अपने क्षेत्र, जलवायु औ मिट्टी के अनुसार ही सही किस्‍म का चुनाव करना चाहिए। यह जरूरी नहीं की जो किस्‍म राजस्‍थान में भरपूर पैदावार दे वो मध्‍यप्रदेश या बिहार में भी उतनी ही कारगर हो।

उन्नत बीज: RH 30, T 59 (Varuna), Pusa Bold, Bio 902 ( पूसा जय किसान), RH 9304, RN 393 इत्यादि।

बीज का उपचार अत्‍यंक आवश्‍क है। बीजों के सही जमाव और जड़ गलन जैसी बीमारियों की रोकथाम बीजोपचार पर ही निर्भर है। बुवाई से पूर्व मेंकोजेब या थाइरम (2-2.5 ग्राम/किग्रा. बीज ) से बीज उपचार करना चाहिए। प्रति एकड़ बीज की मात्रा भी काफी महत्‍वपूर्ण है। अपनी जमीन के अनुसार बीज डालें। अगर बीज का जमाव सही होता है तो एक एकड़ में एक किलोग्राम बीज काफी है। अगर जमीन में बीज का जमाव सही नहीं होता हो तो बीज ज्‍यादा भी डाला जा सकता है।

समय पर बुआई

बारानी क्षेत्रों में सरसों की बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्‍टूबर तक एवं सिंचित क्षेत्रों में 10 से 25 अक्‍टूबर तक कर लेनी चाहिए। यदि फसल को देरी से बोया जाता हैं तो पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं साथ ही चैंपा एवं सफेद रोली आदि का ज्‍यादा प्रकोप होता है। सरसों की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से.मी. होनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

सिंचित फसल के लिए 8-10 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के लिए 3-4 सप्ताह पूर्व खेत में डालकर खेत की तैयारी करें एवं बारानी क्षेत्र में वर्षा से पूर्व 4-5 टन सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर खेत में डाल देवे। सिंचित क्षेत्रों में 80 की.ग्रा. नाइट्रोजन, 30-40 की.ग्रा. फास्फोरस एवं 375 की.ग्रा. जिप्सम या 60 की.ग्रा. गंधक चूर्ण प्रति हेक्टेयर की दर से डाले। नाइट्रोजन की आधी व फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय देवे। शेष आधी मात्रा (नाइट्रोजन) प्रथम सिंचाई के समय डालें।

सिंचाई

सरसों की फसल में सही समय पर सिंचाई देने पर पैदावार में बढ़ोतरी होती हैं। यदि वर्षा अधिक होती हैं तो फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती हैं, परन्तु यदि वर्षा समय पर न हो तो 2 सिंचाई आवश्यक हैं। प्रथम सिंचाई बुवाई के 30-40 दिन बाद (फूल आने से पहले) एवं द्वितीय सिंचाई 70-80 दिन की अवस्था में करें। यदि फसल की कमी हो तो एक सिंचाई 40-50 दिन की फसल में करें।

रोग और उपचार

सरसों में तैले और चैपे की समस्‍या काफी आती है। इसके लिए एक एकड़ में 200 लीटर पानी में 60 मि.ली. कन्‍फीडोर (Imidacloprid 200 SL (17.8 % w/w))या फिर 60 ग्राम एक्‍टारा (thiamethoxam ) की स्‍प्रे करें।

आल्टरनेरया ब्लाइट जिसे झुलसा रोग के नाम से भी जानते हैं । इस रोग से बचाव के लिए रोडोमल एम जेडजेड ( Ridomil ZM) या डायथेन एम. 85 का 2.5 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर बुआई के 40 से 45 दिन बाद एक स्‍प्रे और फिर बुआई के 60 दिन बाद दूसरी स्‍प्रे करें। सफेद रतुआ भी सरसों में बहुत आता है। पत्‍तों पर फफोले बन जाते हैं। कुछ दिन बाद ये धब्‍बे आपस में मिलकर पूरे पत्‍ते को ही खराब कर देते हैं। इसके नियंत्रण के लिए रडोमल एम.जेड. को 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर पंद्रह दिन में दो छिड़काव करने चाहिए।

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